प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव |
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ||८-१०||
prayāṇakāle manasā.acalena bhaktyā yukto yogabalena caiva .
bhruvormadhye prāṇamāveśya samyak sa taṃ paraṃ puruṣamupaiti divyam ||8-10||
।।8.10।। वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है।