ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये |
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ||१५-४||
tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ .
tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye .
yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||15-4||
।।15.4।।उसके बाद उस परमपद-(परमात्मा-) की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह सृष्टि विस्तारको प्राप्त हुई है, उस आदिपुरुष परमात्माके ही मैं शरण हूँ।